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डाईंग डिक्लेरेशन यानी मृत्युकालीक कथन क्या होता है ?

नमस्कार दोस्तों स्वागत है। आपका आज की ब्लॉग पोस्ट में दोस्तों आज के इस ब्लॉग में हम आपको बताने जा रहे हैं। डाईंग डिक्लेरेशन के बारे में दोस्तों और डाईंग डिक्लेरेशन हमारे क़ानून का एक बहुत ही शानदार कांसेप्ट है। डाईंग डिक्लेरेशन का सिंपल सा मतलब होता है। जब कोई व्यक्ति मरने वाला होता है, उससे पहले उस व्यक्ति द्वारा दिया गया कोई बयान डाईंग डिक्लेरेशन के रूप में जाना जाता है




दोस्तों डाईंग डिक्लेरेशन यानी मृत्युकालीक कथन के कांसेप्ट को जानने के लिए हम आपको कुछ सवाल जवाब के रूप में इस कांसेप्ट को समझाने की कोशिश करते हैं ताकि आपको यह जो कॉन्सेप्ट बहुत ही आसानी से समझ में आ जाए और आपके मन में डाईंग डिक्लेरेशन से रिलेटेड जो भी सवाल जवाब आपके दिमाग में आएंगे, उनका भी हल हो जाएगा तो दोस्तों देखते हैं। आखिर डाईंग डिक्लेरेशन क्या है और इसको किस तरीके से हमारा कानून देखता है।

1. मृत्युकालीक कथन का क्या कोई फॉर्मेट होता है या होना चाहिए ?

नही ऐसा कुछ आवश्यक नही है मृत्युकालिक कथन मौखिक हो सकता है या फिर लिखित भी हो सकता है जहां तक मौखिक बयान का सवाल है, तो इसका अस्तित्व या इसको मरने वाले व्यक्ति को सुनाने और व समझाने का कोई प्रश्न नहीं उठता है इसलिए इसका कोई निश्चित फॉरमेट नही होता है। और एक केस
गणपत लाड के मामले में मृत्युकालिक कथन का कोई निश्चित फॉर्मेट नहीं होने की बात कही माननीय सुप्रीम कोर्ट ने।

2.क्या सिर्फ मृत्यु के समय ही मृत्युकालिक कथन का होना आवश्यक है ?


तो इसका जबाब है नही मृत्यु कालिक कथन को केवल इस आधार पर कोर्ट खारिज नहीं कर सकता है की मृत्युकालिक कथन ठीक मृत्यु के समय नहीं था या नही कहा गया था। फ्रेंड्स मृत्युकालिक कथन किसी भी समय कहा जा सकता है तथा इस कथन का संबंध सिर्फ घटना और परिस्थितियों से होता और डाईंग डिक्लेरेशन करने वाले के मन मे अपनी मृत्यु होने की सॉलिड आसंका होनी चाहिए। तो कथन को एड्मिससबले माना जाता है लॉ ऑफ कोर्ट में।

3.क्या डाईंग डिक्लेरेशन के कथन की पुष्टि की आवश्यकता होती है
?


इसका जबाब है नही । किसी भी मृत्युकालिक कथन में पुष्टि की आवश्यकता नहीं होती है। इसे एक प्रेसिडेंट केस शांति बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि मृत्यु कालिक कथन में पुष्टि आवश्यक नहीं होती है क्योंकि हो सकता है कि स्वतंत्र गवाह पुष्टि करने के लिए मिल ही ना पा रहे हों ? और अक्सर ऐसा ही होता है। अगर कोर्ट हर डाईंग डिक्लेरेशन की पुष्टि करने बैठ जाये तो मुमकिन है कि यह कॉन्सेप्ट नही ना रहे।

4.तो क्या विश्वास की कसौटी पर नही परखा जाता है डाईंग डिक्लरेशन को ?


जी हां बिल्कुल परखा जाता है मृत्युकालिक कथन को विश्वास योग्य मानने से पूर्व कोर्ट द्वारा उचित सावधानी तथा सतर्कता बरती जाती है। जब कथन के बारे में यह लगे कि वह विश्वसनीयता के साथ था तो इसके आधार पर ही आगे की कार्यवाही की जाती है।


5.क्या पुलिस के समक्ष मृत्युकालीन कथन किया जा सकता है ?


हाँ बिल्कुल किया जा सकता है पुलिस इस मृत्युकालिक कथन को एफआईआर रिपोर्ट में दर्ज कर सकती है। एक मामले में एक व्यक्ति थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाने आया। वह व्यक्ति अत्यंत घायल था, रिपोर्ट लिखाने के कुछ घंटे के भीतर उस व्यक्ति की मौत हो गई। तो माननीय न्यायालय द्वारा इस कथन को उसका मृत्युकालिक कथन के रूप में माना गया एवं उसे सुसंगत भी माना गया।

6. क्या इशारों के माध्यम से भी मृत्युकालिक कथन किया जा सकता है ?

हाँ बिल्कुल किया जा सकता है मृत्यु कालिक कथन इशारों के माध्यम से भी किया जा सकता है, एवं किसी लिखित या मौखिक कथन की तरह ही उस कथन की मान्यता होती है यह सिद्धान्त इलाहाबाद उच्च न्यायालय की पूर्ण न्यायपीठ ने में क्वीन बनाम अब्दुल्लाह के मामले में प्रतिपादित किया था।

7. यदि मृत्युकालिक कथन करने वाला जीवित बच जाए तो उस परिस्थिति में क्या उसके कथन का क्या होगा ?


यदि मृत्युकालिक कथनकर्ता जीवित रह जाए तो उसका कथन मृत्युकालिक कथन नहीं माना जाता है। वह केवल ऐसा कथन होगा जिसे इन्वेस्टिगेशन के दौरान किया गया माना जायेगा।उसे मृत्युकालिक कथन नही माना जायेगा।

दोस्तों डिक्लेरेशन के ऊपर हमारा एक वीडियो भी है जिसमें मैंने बहुत ही अच्छी तरीके से आपको डाईंग डिक्लेरेशन समझाने की कोशिश की है तो आप नीचे दिया गया वीडियो भी देख सकते हैं। 👇👇





दोस्तों अगर आपको हमारा यह वीडियो पसंद आया है तो आप हमारा चैनल Advocate Raaj Rathore को यूट्यूब पर सब्सक्राइब कर सकते हैं ऐसे ही कानूनी ज्ञानवर्धक वीडियोस देखेंने के लिये !

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